Passage 5.11
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यथा सर्वलोकस्य चक्षुः सूर्यः चाक्षुषैः बाह्यदोषैः न लिप्यते, तथा एकः सर्वभूतान्तरात्मा बाह्यः [सन्] लोकदुःखेन न लिप्यते ।
हिन्दी अर्थ
जैसे सब लोकों की आँख सूर्य देखने वाले की बाहरी दृष्टिगत अशुद्धियों से नहीं लिप्त होता, वैसे ही सभी भूतों की एक अन्तरात्मा जगत के दुःख से लिप्त नहीं होती, क्योंकि वह उससे परे है।
English meaning
As the sun, the eye of the whole world, is not stained by external defects associated with sight, so the one inner self of all beings is not stained by the world’s suffering, being beyond it.
व्याख्या
सूर्य प्रकाश देता है पर प्रकाशित वस्तुओं के दोष ग्रहण नहीं करता। यह आत्मा की असंलिप्तता का तर्क है, पीड़ित लोगों का दुःख तुच्छ मानने या सहायता रोकने का कारण नहीं।
Explanation
The sun illuminates objects without acquiring their defects. The analogy argues for the self’s non-involvement, not for dismissing suffering people or withholding help.
संदर्भ
तीसरी उपमा पूछती है कि सर्वात्मा दुःख से कैसे असंलिप्त रहता है।
Context
A third analogy addresses how the universal self remains untouched by suffering.