Passage 5.10
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥
पदच्छेद
अन्वय
यथा एकः वायुः भुवनम् प्रविष्टः रूपम् रूपम् प्रतिरूपः बभूव, तथा एकः सर्वभूतान्तरात्मा रूपम् रूपम् प्रतिरूपः [भवति], बहिः च [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जैसे एक वायु जगत में प्रवेश करके प्रत्येक रूप के अनुसार रूप धारण करती है, वैसे ही सभी भूतों की एक अन्तरात्मा प्रत्येक रूप के अनुरूप प्रकट होती है और बाहर भी है।
English meaning
As one air, entering the world, takes a form corresponding to each thing, so the one inner self of all beings appears according to each form and is also beyond them.
व्याख्या
वायु का उदाहरण सर्वत्र प्रवेश और रूपों की सीमाओं से असम्बद्धता को उभारता है। लगभग समान पदों की पुनरावृत्ति जानबूझकर है; यह पाठ का दोहराव है, सम्पादन की भूल नहीं।
Explanation
Air stresses pervasive entry without confinement to the outlines of particular forms. The nearly identical wording is deliberate repetition in the text, not an editorial duplication.
संदर्भ
अग्नि के बाद वायु उसी एक-अनेक सम्बन्ध को दूसरी दिशा से दिखाती है।
Context
Air follows fire as a second model for the relation of one and many.