Passage 1.6
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥
पदच्छेद
यःyaḥतुtuसर्वाणिsarvāṇiभूतानिbhūtāniआत्मनिātmaniएवevaअनुपश्यतिanupaśyatiसर्वभूतेषुsarvabhūteṣuचcaआत्मानम्ātmānamततःtataḥनnaविजुगुप्सतेvijugupsate
अन्वय
यः तु सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति, सर्वभूतेषु च आत्मानम् [अनुपश्यति], ततः [सः] न विजुगुप्सते ।
हिन्दी अर्थ
जो सभी प्राणियों को आत्मा में और आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, वह किसी से घृणा नहीं करता।
English meaning
One who sees all beings in the Self, and the Self in all beings, does not recoil from anyone.
व्याख्या
एकत्व-दृष्टि का यहाँ व्यवहार से सम्बन्ध है: दूसरे प्राणी को पूर्णतः पराया देखने की प्रवृत्ति ढीली पड़ती है। विजुगुप्सते में घृणा के साथ दूर हटना या बचना भी अर्थ-संकेत हो सकता है।
Explanation
The vision of oneness has a practical dimension here: another being ceases to appear wholly alien. Vijugupsate can suggest recoiling or avoidance as well as hatred.
संदर्भ
इन दो मन्त्रों में एकत्व-दृष्टि के साथ घृणा, मोह और शोक के क्षय का सम्बन्ध दिखाया गया है।
Context
These two passages connect a vision of oneness with the ending of aversion, delusion and grief.