Passage 1.16
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः । यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
पूषन् एकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य, रश्मीन् व्यूह, तेजः समूह । ते यत् कल्याणतमम् रूपम् [अस्ति], ते तत् [रूपम् अहम्] पश्यामि । यः असौ असौ पुरुषः, सः अहम् अस्मि ।
हिन्दी अर्थ
हे पोषक, अकेले चलने वाले, नियामक, सूर्य, प्रजापति के पुत्र! अपनी किरणें हटा लो और तेज समेट लो। मैं तुम्हारा सबसे कल्याणमय रूप देखना चाहता हूँ। वहाँ जो पुरुष है, वह मैं हूँ।
English meaning
O nourisher, solitary traveller, governor, Sun, offspring of Prajapati: draw back your rays and gather your radiance. May I see your most auspicious form. That person there: I am he.
व्याख्या
यहाँ अनेक वैदिक सम्बोधनों के बाद वक्ता पुरुष के साथ अपनी एकता कहता है। मैं वही हूँ का कथन मन्त्र की आवाज़ है; इसका दार्शनिक अर्थ विभिन्न परम्पराएँ अपने ढंग से स्पष्ट करती हैं।
Explanation
After several Vedic invocations, the speaker declares identity with the person there. I am he belongs to the voice of the mantra; traditions explain its philosophical force differently.
संदर्भ
इन मन्त्रों में सूर्य और पूषन् से आवरण हटाकर सत्य के दर्शन की प्रार्थना की गई है।
Context
The prayer asks the Sun, addressed as Pushan, to remove the covering and reveal truth.