Passage 3.6
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । सैषा भार्गवी वारुणी विद्या । परमे व्योमन्प्रतिष्ठिता । स य एवं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन महान् कीर्त्या ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[भृगुः] आनन्दः ब्रह्म इति व्यजानात् । आनन्दात् हि एव खलु इमानि भूतानि जायन्ते; जातानि आनन्देन जीवन्ति; प्रयन्ति आनन्दम् अभिसंविशन्ति इति । सा एषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता [अस्ति] । यः एवम् वेद, सः प्रतितिष्ठति; अन्नवान् अन्नादः भवति; प्रजया पशुभिः ब्रह्मवर्चसेन महान् भवति, कीर्त्या महान् [भवति] ।
हिन्दी अर्थ
उन्होंने जाना कि आनन्द ब्रह्म है। निश्चय ही आनन्द से ये प्राणी उत्पन्न होते हैं, आनन्द से उत्पन्न होकर जीवित रहते हैं और आनन्द में जाते हुए प्रवेश कर जाते हैं। यही भृगु की, वरुण से प्राप्त विद्या है; यह परम आकाश में प्रतिष्ठित है। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह प्रतिष्ठित होता है। वह अन्न से संपन्न और अन्न का भोक्ता होता है। वह संतति, पशुधन और ब्रह्मविद्या के तेज से महान होता है; कीर्ति से महान होता है।
English meaning
He discerned that bliss is Brahman. For it is indeed from bliss that these beings arise; through bliss they live once born, and into bliss they pass and enter. This is the knowledge of Bhṛgu, received from Varuṇa, established in the highest expanse. Whoever knows in this way becomes firmly established. That person possesses food and is an eater of food, becomes great through offspring, livestock, and the radiance of sacred learning, and becomes great in renown.
व्याख्या
इस क्रम में आनन्द को केवल क्षणिक सुख की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं है; उसे जीवों के आधार के रूप में रखा गया है। “परम आकाश” की व्याख्या व्यापक आध्यात्मिक अवकाश या अन्तःस्थित परम आधार के रूप में की गई है, पर मूल वाक्य स्वयं यह विस्तार नहीं देता। अन्न, संतति, पशुधन और कीर्ति की सूची प्राचीन समृद्धि-आदर्श को व्यक्त करती है; यह आज के पाठक के लिए सुनिश्चित भौतिक लाभ का वादा नहीं है।
Explanation
Within this progression, bliss is not simply a passing pleasant sensation: it is presented as the ground of beings. The “highest expanse” has been interpreted as a supreme spiritual or inward ground, but the sentence itself does not spell out that interpretation. Food, offspring, livestock, and reputation express an ancient ideal of flourishing, not guaranteed material results for a present-day reader.
संदर्भ
आनन्द की पहचान पर पिता के पास लौटने वाला क्रम समाप्त होता है। वर्णन अब भृगु और वरुण से संबद्ध विद्या का नाम लेकर उसके प्रतिष्ठान और पारंपरिक फल को बताता है।
Context
With the recognition of bliss, the recurring return to the father ends. The narration names the teaching associated with Bhṛgu and Varuṇa and describes its establishment and traditional fruits.