Passage 3.10
न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद्व्रतम् । तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । अराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्नँराद्धम् । मुखतोऽस्मा अन्नँराध्यते । एतद्वै मध्यतोऽन्नँराद्धम् । मध्यतोऽस्मा अन्नँराध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नँराद्धम् । अन्ततोऽस्मा अन्नँराध्यते ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
वसतौ कञ्चन न प्रत्याचक्षीत; तत् व्रतम् [अस्ति] । तस्मात् यया कया च विधया बहु अन्नम् प्राप्नुयात् । [अन्नवन्तः विद्वांसः] अस्मा [अभ्यागताय] अन्नम् अराधि इति आचक्षते । एतत् वै मुखतः अन्नम् राद्धम् [दाता प्रयच्छति]; अस्मा [अन्नदात्रे] मुखतः अन्नम् राध्यते । एतत् वै मध्यतः अन्नम् राद्धम् [दाता प्रयच्छति]; अस्मा [अन्नदात्रे] मध्यतः अन्नम् राध्यते । एतत् वा अन्ततः अन्नम् राद्धम् [दाता प्रयच्छति]; अस्मा [अन्नदात्रे] अन्ततः अन्नम् राध्यते ।
हिन्दी अर्थ
ठहरने के लिए आए किसी व्यक्ति को नहीं लौटाना चाहिए; यही व्रत है। इसलिए जिस किसी उपाय से हो, पर्याप्त अन्न प्राप्त करना चाहिए। लोग कहते हैं, “इसके लिए अन्न तैयार है।” यदि अन्न उत्तम ढंग से तैयार किया गया है, तो उसके लिए अन्न उत्तम ढंग से तैयार होता है। यदि अन्न मध्यम ढंग से तैयार किया गया है, तो उसके लिए अन्न मध्यम ढंग से तैयार होता है। यदि अन्न निम्न ढंग से तैयार किया गया है, तो उसके लिए अन्न निम्न ढंग से तैयार होता है।
English meaning
One should not turn away anyone who comes seeking lodging; that is the vow. Therefore, by whatever means one can, one should obtain abundant food. People say, “Food has been prepared for this person.” If food is prepared in the foremost manner, food is made ready for its giver in the foremost manner. If food is prepared in an intermediate manner, food is made ready for its giver in an intermediate manner. If food is prepared in the lowest manner, food is made ready for its giver in the lowest manner.
व्याख्या
“मुखतः, मध्यतः, अन्ततः” को यहाँ उत्तम, मध्यम और निम्न सत्कार की रीति के रूप में लिया गया है; इनका सम्बन्ध जीवन के आरम्भ, मध्य और अन्त से भी जोड़ा गया है। मूल आशय अतिथि के प्रति उदारता और दान की गुणवत्ता पर ध्यान देना है। “जिस किसी उपाय से” प्राचीन व्रत की भाषा है, हानिकारक या अनुचित उपाय अपनाने की अनुमति नहीं। समान प्रतिफल का कथन धार्मिक फल-वर्णन है, जाँचा हुआ आर्थिक नियम नहीं।
Explanation
Mukhataḥ, madhyataḥ, and antataḥ are rendered here as foremost, intermediate, and lowest ways of receiving a guest; they have also been understood as early, middle, and late periods of life. The passage emphasizes hospitality and the quality of giving. “By whatever means” is the language of an ancient vow, not authorization for harmful or wrongful conduct. The matching return is a religious account of fruits, not a tested economic rule.
संदर्भ
दसवाँ अनुवाक अतिथि को आश्रय और भोजन देने की गृहस्थ-परंपरा से आरम्भ होता है। भोजन देने के प्रकार और दाता को मिलने वाले भोजन के बीच समानता स्थापित की जाती है।
Context
The final anuvāka begins within the household tradition of offering a guest shelter and food. It describes a correspondence between the manner of giving food and the food that becomes available to its giver.