Passage 3.7
अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन महान् कीर्त्या ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अन्नम् न निन्द्यात्; तत् व्रतम् [अस्ति] । प्राणः वा अन्नम् [अस्ति]; शरीरम् अन्नादम् [अस्ति] । प्राणे शरीरम् प्रतिष्ठितम् [अस्ति]; शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः [अस्ति] । तत् एतत् अन्ने अन्नम् प्रतिष्ठितम् [अस्ति] । यः एतत् अन्ने अन्नम् प्रतिष्ठितम् वेद, सः प्रतितिष्ठति; अन्नवान् अन्नादः भवति; प्रजया पशुभिः ब्रह्मवर्चसेन महान् भवति, कीर्त्या महान् [भवति] ।
हिन्दी अर्थ
अन्न की निन्दा नहीं करनी चाहिए; यही व्रत है। प्राण ही अन्न है और शरीर अन्न का भोक्ता है। प्राण में शरीर प्रतिष्ठित है, और शरीर में प्राण प्रतिष्ठित है। इस प्रकार यह अन्न अन्न में प्रतिष्ठित है। जो इस अन्न को अन्न में प्रतिष्ठित जानता है, वह प्रतिष्ठित होता है। वह अन्न से संपन्न और अन्न का भोक्ता होता है। वह संतति, पशुधन और ब्रह्मविद्या के तेज से महान होता है; कीर्ति से महान होता है।
English meaning
One should not disparage food; that is the vow. Life-breath is food, and the body is the eater of food. The body is established in life-breath, and life-breath is established in the body. Thus food is established in food. Whoever knows food as established in food becomes firmly established. That person possesses food and is an eater of food, becomes great through offspring, livestock, and the radiance of sacred learning, and becomes great in renown.
व्याख्या
एक ही सम्बन्ध में शरीर पोषित होता है और प्राण उसका आधार है; दूसरे दृष्टिकोण से प्राण शरीर में स्थित है। इसी परस्परता के कारण पाठ “अन्न अन्न में प्रतिष्ठित है” कहता है। यह ध्यानात्मक सम्बन्ध है, शरीर-विज्ञान का शाब्दिक विवरण नहीं; समृद्धि का दोहराया गया फल भी परंपरागत प्रशंसा के रूप में पढ़ना चाहिए।
Explanation
The body depends on vital activity, while life-breath is situated in the body. This reciprocity accounts for the expression “food established in food.” It is a contemplative relationship rather than a literal anatomical account, and the repeated prosperity formula remains a traditional commendation.
संदर्भ
ब्रह्म की खोज के बाद वल्ली अन्न के प्रति आचरण और ध्यान का विषय सामने रखती है। यहाँ प्राण और शरीर की परस्पर निर्भरता को अन्न और अन्न-भोक्ता की भाषा में व्यक्त किया गया है।
Context
After the inquiry into Brahman, the vallī introduces conduct and contemplation concerning food. The interdependence of life-breath and body is expressed through the relation of food and its eater.