Passage 3.4
मनो ब्रह्मेति व्यजानात् । मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । मनसा जातानि जीवन्ति । मनः प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तँ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[भृगुः] मनः ब्रह्म इति व्यजानात् । मनसः हि एव खलु इमानि भूतानि जायन्ते; जातानि मनसा जीवन्ति; प्रयन्ति मनः अभिसंविशन्ति इति । तत् विज्ञाय पुनः एव पितरम् वरुणम् उपससार-भगवः, ब्रह्म अधीहि इति । तम् ह उवाच-तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व; तपः ब्रह्म इति । सः तपः अतप्यत; सः तपः तप्त्वा [विज्ञानम् ब्रह्म इति व्यजानात्] ।
हिन्दी अर्थ
उन्होंने जाना कि मन ब्रह्म है। निश्चय ही मन से ये प्राणी उत्पन्न होते हैं, मन से उत्पन्न होकर जीवित रहते हैं और मन में जाते हुए प्रवेश कर जाते हैं। यह जानकर वे फिर अपने पिता वरुण के पास पहुँचे और बोले, “भगवन्, मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए।” उन्होंने उनसे कहा, “तप के द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा करो। तप ब्रह्म है।” भृगु ने तप किया। तप करने के बाद…
English meaning
He discerned that mind is Brahman. For it is indeed from mind that these beings arise; through mind they live once born, and into mind they pass and enter. Having understood this, he again approached his father Varuṇa and said, “Revered sir, teach me about Brahman.” He told him, “Seek to know Brahman through tapas. Tapas is Brahman.” Bhṛgu practised tapas. Having practised tapas…
व्याख्या
यह कथन उपनिषद की दार्शनिक खोज का एक चरण है, न कि यह वैज्ञानिक दावा कि व्यक्तिगत विचार भौतिक जगत को इच्छानुसार पैदा करते हैं। मन अनुभव को ग्रहण और व्यवस्थित करता है, फिर भी भृगु उसकी पहचान पर रुक नहीं जाते। अगले अनुवाक में विज्ञान, अर्थात् विवेकपूर्ण बोध, अलग से सामने आता है।
Explanation
This is a stage in the Upaniṣad’s philosophical inquiry, not a scientific claim that individual thoughts manufacture the physical world at will. Mind receives and organizes experience, but Bhṛgu does not stop with identifying it. The next passage distinguishes vijñāna, discerning understanding.
संदर्भ
खोज अब बाहरी पोषण और जीवनी-क्रिया से मन के स्तर पर पहुँचती है। मन को भी उत्पत्ति, स्थिति और प्रवेश की उसी कसौटी पर देखा जाता है।
Context
The inquiry now moves from nourishment and vital activity to mind. Mind is considered through the same pattern of arising, continuing to live, and entering back.