Passage 3.9
तच्छिश्नेनाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ९ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[सः पुरुषः] तत् [अन्नम्] शिश्नेन अजिघृक्षत्; तत् शिश्नेन ग्रहीतुम् न अशक्नोत् । सः यत् ह एनत् शिश्नेन अग्रहैष्यत्, विसृज्य ह एव अन्नम् अत्रप्स्यत् ।
हिन्दी अर्थ
उसने अन्न को जननेन्द्रिय से पकड़ना चाहा, पर उससे न पकड़ सका। यदि उससे अन्न ग्रहण हो जाता, तो केवल उत्सर्जन करके ही तृप्ति हो जाती।
English meaning
It tried to grasp the food with the generative organ but could not. Had that organ been able to take in food, emission alone would have brought satisfaction.
व्याख्या
पूर्ववर्णित रेतस्-सम्बन्ध के कारण विसृज्य का अर्थ यहाँ उत्सर्जन या वीर्य-त्याग की दिशा में है। बाहर छोड़ने और भीतर पोषण ग्रहण करने के कार्यों को विपरीत रखा गया है। कथन शरीर की शक्ति का कार्यभेद बताता है; इसे यौन व्यवहार सम्बन्धी परामर्श या नैतिक निषेध नहीं समझना चाहिए।
Explanation
Given the earlier association with seed, visrijya points here toward emission. Releasing outward is contrasted with taking nourishment inward. The passage differentiates bodily functions; it is neither advice about sexual behavior nor a moral prohibition.
संदर्भ
अन्न ग्रहण के असफल प्रयासों का यह अन्तिम चरण है। इसके बाद अपान द्वारा सफल ग्रहण वर्णित है।
Context
This is the last unsuccessful attempt to take in food. The next passage describes successful intake through apana.