Passage 3.5
तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात् पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् । पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात् संप्रसूताः ॥ २.१.५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तस्मात् अग्निः [जायते], यस्य समिधः सूर्यः [अस्ति] । सोमात् पर्जन्यः [जायते]; पृथिव्याम् ओषधयः [जायन्ते] । पुमान् योषितायाम् रेतः सिञ्चति । बह्वीः प्रजाः पुरुषात् सम्प्रसूताः [सन्ति] ।
हिन्दी अर्थ
उससे वह अग्नि उत्पन्न होती है जिसका ईंधन सूर्य है; सोम से पर्जन्य और पृथिवी पर वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं। पुरुष स्त्री में बीज सींचता है; इस प्रकार अनेक प्रजाएँ उस परम पुरुष से उत्पन्न होती हैं।
English meaning
From him comes the fire whose fuel is the sun; from Soma comes rain, and plants arise upon the earth. A man deposits seed in a woman; the many kinds of offspring thus have their origin in the Person.
व्याख्या
यह क्रम जन्म को केवल अन्तिम माता-पिता तक सीमित न रखकर उन पोषणकारी प्रक्रियाओं से जोड़ता है जिन पर जीवन निर्भर करता है। अग्नि और ईंधन की यज्ञात्मक भाषा यहाँ ब्रह्माण्डीय सम्बन्ध व्यक्त करती है; सोम तथा वर्षा का सम्बन्ध इस प्राचीन दृष्टि का भाग है, आधुनिक मौसम-विज्ञान का कथन नहीं।
Explanation
The sequence places birth within sustaining processes beyond its immediate parents. The sacrificial language of fire and fuel expresses cosmic relations here; the connection between Soma and rain belongs to this ancient account, not to a modern meteorological claim.
संदर्भ
विश्व-पुरुष के चित्र के बाद यह मन्त्र आकाशीय अग्नि, वर्षा, वनस्पति और मानव-जन्म को एक उत्पत्ति-क्रम में जोड़ता है।
Context
After the image of the cosmic Person, this mantra links celestial fire, rainfall, plants, and human generation in one sequence of emergence.