Passage 1.9
जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽप्तेरादिमत्त्वाद्वाऽऽप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥
पदच्छेद
अन्वय
जागरितस्थानः वैश्वानरः आप्तेः आदिमत्त्वात् वा अकारः प्रथमा मात्रा [अस्ति] । यः एवम् वेद, [सः] ह वै सर्वान् कामान् आप्नोति, आदिः च भवति ।
हिन्दी अर्थ
जाग्रत अवस्था का वैश्वानर अकार है, पहली मात्रा; इसका सम्बन्ध व्याप्ति अथवा प्रथम होने से है। जो ऐसा जानता है, वह सब इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करता है और अग्रणी होता है।
English meaning
Vaishvanara, situated in waking, is A, the first measure, through pervasiveness or being first. One who knows this obtains desired objects and becomes foremost.
व्याख्या
अकार, आप्ति और आदि के सम्बन्ध में ध्वनि-साम्य और अर्थ-साम्य दोनों हैं। अन्त में दिया गया फल पाठ का उपासना-सम्बन्धी कथन है, जीवन में निश्चित भौतिक सफलता की हमारी गारंटी नहीं।
Explanation
A, apti and adi are connected through sound and meaning. The promised result belongs to the text's contemplative teaching; we are not guaranteeing material success.
संदर्भ
माण्डूक्य उपनिषद् में आत्मा के चार पादों और ॐ की मात्राओं का विवेचन।
Context
The Mandukya teaching relates the four quarters of the Self to the measures of Om.