Passage 1.7
नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणं अचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[तत्] न अन्तःप्रज्ञम्, न बहिःप्रज्ञम्, न उभयतःप्रज्ञम्, न प्रज्ञानघनम्, न प्रज्ञम्, न अप्रज्ञम्; अदृष्टम् अव्यवहार्यम् अग्राह्यम् अलक्षणम् अचिन्त्यम् अव्यपदेश्यम् एकात्मप्रत्ययसारम् प्रपञ्चोपशमम् शान्तम् शिवम् अद्वैतम् चतुर्थम् [इति] मन्यन्ते । सः आत्मा [अस्ति]; सः विज्ञेयः [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
उसे न भीतर का ज्ञाता, न बाहर का ज्ञाता, न दोनों का ज्ञाता, न प्रज्ञान का घन, न सामान्य ज्ञान वाला और न अज्ञान वाला कहा जाता है। वह इन्द्रियों से अदृष्ट, व्यवहार से परे, पकड़ में न आने वाला, लक्षणरहित, विचार से परे और वर्णन से परे है। एक आत्मा की अनुभूति उसका सार है; उसमें प्रपञ्च शान्त हो जाता है। वह शान्त, शिव और अद्वैत है। उसे चौथा मानते हैं; वही आत्मा है और वही जानने योग्य है।
English meaning
The fourth is neither inward awareness, outward awareness, awareness of both, a mass of awareness, ordinary cognition, nor non-cognition. It is unseen, beyond transactions, ungraspable, without distinguishing marks, unthinkable and indescribable. Its essence is recognition of the one Self; in it the manifold world subsides. Peaceful, auspicious and nondual, it is considered the fourth. That is the Self; that is to be known.
व्याख्या
यह नकारों के द्वारा समझाने वाला केन्द्रीय मन्त्र है। चौथे को न सामान्य जाग्रत ज्ञान, न स्वप्न और न केवल गहरी नींद से बराबर करना चाहिए। शिव का यहाँ सरल अर्थ कल्याणमय दिया गया है; विशेष सम्प्रदायगत निष्कर्ष नहीं जोड़ा गया है।
Explanation
This central passage teaches through successive negations. The fourth should not be equated with ordinary waking cognition, dreaming or simply deep sleep. Shiva is rendered here as auspicious without imposing a sectarian identification.
संदर्भ
माण्डूक्य उपनिषद् में आत्मा के चार पादों और ॐ की मात्राओं का विवेचन।
Context
The Mandukya teaching relates the four quarters of the Self to the measures of Om.