Passage 1.10
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षात् उभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याऽब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥
पदच्छेद
अन्वय
स्वप्नस्थानः तैजसः उत्कर्षात् उभयत्वात् वा उकारः द्वितीया मात्रा [अस्ति] । यः एवम् वेद, [सः] ह वै ज्ञानसन्ततिम् उत्कर्षति, समानः च भवति; अस्य कुले अब्रह्मवित् न भवति ।
हिन्दी अर्थ
स्वप्न अवस्था का तैजस उकार है, दूसरी मात्रा; इसका सम्बन्ध उत्कर्ष अथवा दोनों के बीच होने से है। जो ऐसा जानता है, उसकी ज्ञान-परम्परा बढ़ती है और वह समभाव को प्राप्त होता है; उसके कुल में ब्रह्म को न जानने वाला नहीं होता।
English meaning
Taijasa, situated in dreaming, is U, the second measure, through elevation or its intermediate position. One who knows this extends the continuity of knowledge and attains evenness; no one ignorant of Brahman is born in that person's lineage.
व्याख्या
उकार और उत्कर्ष तथा बीच की स्थिति का सम्बन्ध ध्यान की उपमा है। कुल में ब्रह्मज्ञानी होने का फल पाठ का कथन है; इसे किसी परिवार के बारे में तथ्यात्मक भविष्यवाणी न समझें।
Explanation
U is related to elevation and intermediate position. The statement about one's lineage is the text's promise, not a factual prediction about any particular family.
संदर्भ
माण्डूक्य उपनिषद् में आत्मा के चार पादों और ॐ की मात्राओं का विवेचन।
Context
The Mandukya teaching relates the four quarters of the Self to the measures of Om.