Passage 2.1
ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम् । तदेषाऽभ्युक्ता । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति ॥ तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । पृथिव्या ओषधयः । ओषधीभ्योऽन्नम् । अन्नाद्रेतः । रेतसः पुरुषः । स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः । तस्येदमेव शिरः । अयं दक्षिणः पक्षः । अयमुत्तरः पक्षः । अयमात्मा । इदं पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
ॐ । ब्रह्मवित् परम् आप्नोति । तत् एषा [ऋक्] अभ्युक्ता-सत्यम् ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म [अस्ति] । यः गुहायाम् परमे व्योमन् निहितम् [ब्रह्म] वेद, सः विपश्चिता ब्रह्मणा सह सर्वान् कामान् अश्नुते इति । तस्मात् वै एतस्मात् आत्मनः आकाशः सम्भूतः । आकाशात् वायुः [सम्भूतः]; वायोः अग्निः [सम्भूतः]; अग्नेः आपः [सम्भूताः]; अद्भ्यः पृथिवी [सम्भूता]; पृथिव्याः ओषधयः [सम्भूताः]; ओषधीभ्यः अन्नम् [सम्भूतम्]; अन्नात् रेतः [सम्भूतम्]; रेतसः पुरुषः [सम्भूतः] । सः वै एषः पुरुषः अन्नरसमयः [अस्ति] । तस्य इदम् एव शिरः [अस्ति]; अयम् दक्षिणः पक्षः [अस्ति]; अयम् उत्तरः पक्षः [अस्ति]; अयम् आत्मा [अस्ति]; इदम् पुच्छम् प्रतिष्ठा [अस्ति] । तत् अपि एषः श्लोकः भवति ।
हिन्दी अर्थ
ॐ। ब्रह्म को जानने वाला परम को प्राप्त करता है। इसके विषय में यह ऋचा कही गई है: ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है। जो उसे गुहा में, परम आकाश में निहित जानता है, वह सर्वज्ञ ब्रह्म के साथ सभी कामनाओं की पूर्णता का अनुभव करता है। इसी आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ; आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से औषधियाँ, औषधियों से अन्न, अन्न से रेतस् और रेतस् से पुरुष उत्पन्न हुआ। यह पुरुष अन्न के रस से बना है। यह उसका सिर है; यह दक्षिण पक्ष, यह उत्तर पक्ष, यह उसका मध्य शरीर और यह पुच्छ, प्रतिष्ठा है। इसके विषय में भी यह श्लोक है, जो आगे आता है।
English meaning
Om. The knower of Brahman attains the supreme. Concerning this the following verse is proclaimed: Brahman is truth, knowledge, and the infinite. Whoever knows it lodged in the cave, in the highest space, experiences the fulfilment of all desires together with all-knowing Brahman. From this very Self arose space; from space, wind; from wind, fire; from fire, waters; from waters, earth; from earth, plants; from plants, food; from food, generative seed; and from seed, the person. This person is formed of the essence of food. This is its head; this its right side or wing, this its left side or wing, this its central body, and this its tail, the supporting base. A verse concerning this follows.
व्याख्या
सत्य, ज्ञान और अनन्त ब्रह्म को किसी सीमित वस्तु के रूप में पकड़ने की कठिनाई दिखाते हैं। गुहा और परम आकाश को भीतर की चेतना का संकेत मानना एक प्रमुख पारम्परिक पाठ है। सिर, पक्ष, मध्य और पुच्छ का विन्यास आगे के सूक्ष्म आत्मरूपों में भी आएगा; यह ध्यानात्मक रूपक है। चुने स्रोत का अन्न–रेतस्–पुरुष क्रम ज्यों का त्यों रखा गया है, जबकि तुलना-पाठ सीधे अन्नात्पुरुषः कहते हैं।
Explanation
Truth, knowledge, and infinitude resist treating Brahman as just another bounded object. Reading the cave and highest space as pointing inward toward awareness is a major traditional interpretation. The arrangement of head, wings, centre, and supporting tail will recur for subtler selves; it is a contemplative figure. This source’s food–seed–person sequence is preserved, whereas the comparison witnesses move directly from food to the person.
संदर्भ
ब्रह्मानन्दवल्ली अपनी मुख्य प्रतिज्ञा और ब्रह्म के लक्षण से शुरू होती है। सृष्टि का क्रम भोजन से बने व्यक्ति तक लाकर आगे के आन्तरिक अन्वेषण की भूमि तैयार करता है।
Context
The Brahmananda-valli begins with its central promise and a characterization of Brahman. A creation sequence reaches the food-formed person and prepares the inward inquiry that follows.