Passage 2.8
भीषाऽस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चम इति । सैषाऽऽनन्दस्य मीमाँसा भवति । युवा स्यात्साधुयुवाऽध्यायकः । आशिष्ठो दृढिष्ठो बलिष्ठः । तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् । स एको मानुष आनन्दः । ते ये शतं मानुषा आनन्दाः । स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः । स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः । स एक आजानजानां देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः । स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः । ये कर्मणा देवानपि यन्ति । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः । स एको देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं देवानामानन्दाः । स एक इन्द्रस्याऽऽनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमिन्द्रस्याऽऽनन्दाः । स एको बृहस्पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः । स एको ब्रह्मण आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । स यश्चायं पुरुषे । यश्चासावादित्ये । स एकः । स य एवंवित् । अस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं प्राणमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं मनोमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अस्मात् भीषा वातः पवते; भीषा सूर्यः उदेति; अस्मात् भीषा अग्निः च इन्द्रः च [धावतः], पञ्चमः मृत्युः धावति इति । सा एषा आनन्दस्य मीमांसा भवति । साधुयुवा अध्यायकः आशिष्ठः दृढिष्ठः बलिष्ठः युवा स्यात् । तस्य इयम् सर्वा पृथिवी वित्तस्य पूर्णा स्यात् । सः एकः मानुषः आनन्दः [अस्ति] । ये ते शतम् मानुषाः आनन्दाः [सन्ति], सः एकः मनुष्यगन्धर्वाणाम् आनन्दः [अस्ति]; श्रोत्रियस्य च अकामहतस्य [सः एव आनन्दः अस्ति] । ये ते शतम् मनुष्यगन्धर्वाणाम् आनन्दाः [सन्ति], सः एकः देवगन्धर्वाणाम् आनन्दः [अस्ति]; श्रोत्रियस्य च अकामहतस्य [सः एव आनन्दः अस्ति] । ये ते शतम् देवगन्धर्वाणाम् आनन्दाः [सन्ति], सः एकः चिरलोकलोकानाम् पितॄणाम् आनन्दः [अस्ति]; श्रोत्रियस्य च अकामहतस्य [सः एव आनन्दः अस्ति] । ये ते शतम् चिरलोकलोकानाम् पितॄणाम् आनन्दाः [सन्ति], सः एकः आजानजानाम् देवानाम् आनन्दः [अस्ति]; श्रोत्रियस्य च अकामहतस्य [सः एव आनन्दः अस्ति] । ये ते शतम् आजानजानाम् देवानाम् आनन्दाः [सन्ति], सः एकः कर्मदेवानाम् देवानाम् आनन्दः [अस्ति], ये कर्मणा देवान् अपि यन्ति; श्रोत्रियस्य च अकामहतस्य [सः एव आनन्दः अस्ति] । ये ते शतम् कर्मदेवानाम् देवानाम् आनन्दाः [सन्ति], सः एकः देवानाम् आनन्दः [अस्ति]; श्रोत्रियस्य च अकामहतस्य [सः एव आनन्दः अस्ति] । ये ते शतम् देवानाम् आनन्दाः [सन्ति], सः एकः इन्द्रस्य आनन्दः [अस्ति]; श्रोत्रियस्य च अकामहतस्य [सः एव आनन्दः अस्ति] । ये ते शतम् इन्द्रस्य आनन्दाः [सन्ति], सः एकः बृहस्पतेः आनन्दः [अस्ति]; श्रोत्रियस्य च अकामहतस्य [सः एव आनन्दः अस्ति] । ये ते शतम् बृहस्पतेः आनन्दाः [सन्ति], सः एकः प्रजापतेः आनन्दः [अस्ति]; श्रोत्रियस्य च अकामहतस्य [सः एव आनन्दः अस्ति] । ये ते शतम् प्रजापतेः आनन्दाः [सन्ति], सः एकः ब्रह्मणः आनन्दः [अस्ति]; श्रोत्रियस्य च अकामहतस्य [सः एव आनन्दः अस्ति] । यः च अयम् पुरुषे [अस्ति], यः च असौ आदित्ये [अस्ति], सः एकः [अस्ति] । सः यः एवंवित् [अस्ति], अस्मात् लोकात् प्रेत्य एतम् अन्नमयम् आत्मानम् उपसङ्क्रामति; एतम् प्राणमयम् आत्मानम् उपसङ्क्रामति; एतम् मनोमयम् आत्मानम् उपसङ्क्रामति; एतम् विज्ञानमयम् आत्मानम् उपसङ्क्रामति; एतम् आनन्दमयम् आत्मानम् उपसङ्क्रामति । तत् अपि एषः श्लोकः भवति ।
हिन्दी अर्थ
उसके भय से वायु बहता है; उसके भय से सूर्य उदय होता है; उसके भय से अग्नि और इन्द्र कार्यरत हैं, तथा पाँचवाँ, मृत्यु, दौड़ता है। अब आनन्द की यह मीमांसा होती है। कोई युवा हो, सदाचारी और वेदाध्ययन किया हुआ युवा, अत्यन्त आशावान्, अत्यन्त दृढ़ और अत्यन्त बलवान्; सम्पूर्ण पृथ्वी धन से भरी हुई उसकी हो। यह एक मानुष आनन्द है। मानुष आनन्द की सौ मात्राएँ मनुष्य-गन्धर्वों के आनन्द की एक मात्रा के बराबर हैं; और उतना ही उस वेदज्ञ श्रोत्रिय का आनन्द है जिसे कामना ने आहत नहीं किया। मनुष्य-गन्धर्वों के आनन्द की सौ मात्राएँ देव-गन्धर्वों के आनन्द की एक मात्रा के बराबर हैं; और उतना ही उस वेदज्ञ श्रोत्रिय का आनन्द है जिसे कामना ने आहत नहीं किया। देव-गन्धर्वों के आनन्द की सौ मात्राएँ चिरस्थायी लोकों में रहने वाले पितरों के आनन्द की एक मात्रा के बराबर हैं; और उतना ही उस वेदज्ञ श्रोत्रिय का आनन्द है जिसे कामना ने आहत नहीं किया। चिरस्थायी लोकों में रहने वाले पितरों के आनन्द की सौ मात्राएँ जन्म से देवत्व प्राप्त देवताओं के आनन्द की एक मात्रा के बराबर हैं; और उतना ही उस वेदज्ञ श्रोत्रिय का आनन्द है जिसे कामना ने आहत नहीं किया। जन्म से देवत्व प्राप्त देवताओं के आनन्द की सौ मात्राएँ कर्म से देवत्व को प्राप्त होने वाले कर्मदेवों के आनन्द की एक मात्रा के बराबर हैं; और उतना ही उस वेदज्ञ श्रोत्रिय का आनन्द है जिसे कामना ने आहत नहीं किया। कर्मदेवों के आनन्द की सौ मात्राएँ देवताओं के आनन्द की एक मात्रा के बराबर हैं; और उतना ही उस वेदज्ञ श्रोत्रिय का आनन्द है जिसे कामना ने आहत नहीं किया। देवताओं के आनन्द की सौ मात्राएँ इन्द्र के आनन्द की एक मात्रा के बराबर हैं; और उतना ही उस वेदज्ञ श्रोत्रिय का आनन्द है जिसे कामना ने आहत नहीं किया। इन्द्र के आनन्द की सौ मात्राएँ बृहस्पति के आनन्द की एक मात्रा के बराबर हैं; और उतना ही उस वेदज्ञ श्रोत्रिय का आनन्द है जिसे कामना ने आहत नहीं किया। बृहस्पति के आनन्द की सौ मात्राएँ प्रजापति के आनन्द की एक मात्रा के बराबर हैं; और उतना ही उस वेदज्ञ श्रोत्रिय का आनन्द है जिसे कामना ने आहत नहीं किया। प्रजापति के आनन्द की सौ मात्राएँ ब्रह्मा के आनन्द की एक मात्रा के बराबर हैं; और उतना ही उस वेदज्ञ श्रोत्रिय का आनन्द है जिसे कामना ने आहत नहीं किया। जो यहाँ पुरुष में है और जो वहाँ आदित्य में है, वह एक ही है। जो ऐसा जानता है, वह इस लोक से प्रस्थान करके इस अन्नमय आत्मा को प्राप्त करता है, इस प्राणमय आत्मा को प्राप्त करता है, इस मनोमय आत्मा को प्राप्त करता है, इस विज्ञानमय आत्मा को प्राप्त करता है और इस आनन्दमय आत्मा को प्राप्त करता है। इसके विषय में भी अगला श्लोक है।
English meaning
Out of awe of that, wind blows; out of awe the sun rises; out of awe fire and Indra act, and death runs as the fifth. Now follows an inquiry into bliss. Imagine a young person, good and trained in sacred learning, full of hope, very steadfast and very strong, to whom the whole earth, filled with wealth, belongs. That is one unit of human bliss. A hundred measures of human bliss equal one measure of the bliss of human Gandharvas, and also the bliss of one learned in revelation who is not struck by desire. A hundred measures of the bliss of human Gandharvas equal one measure of the bliss of divine Gandharvas, and also the bliss of one learned in revelation who is not struck by desire. A hundred measures of the bliss of divine Gandharvas equal one measure of the bliss of ancestors dwelling in enduring worlds, and also the bliss of one learned in revelation who is not struck by desire. A hundred measures of the bliss of ancestors dwelling in enduring worlds equal one measure of the bliss of gods who are gods by birth, and also the bliss of one learned in revelation who is not struck by desire. A hundred measures of the bliss of gods who are gods by birth equal one measure of the bliss of the gods who have reached divinity through action, and also the bliss of one learned in revelation who is not struck by desire. A hundred measures of the bliss of the gods who have reached divinity through action equal one measure of the bliss of the gods, and also the bliss of one learned in revelation who is not struck by desire. A hundred measures of the bliss of the gods equal one measure of the bliss of Indra, and also the bliss of one learned in revelation who is not struck by desire. A hundred measures of the bliss of Indra equal one measure of the bliss of Brihaspati, and also the bliss of one learned in revelation who is not struck by desire. A hundred measures of the bliss of Brihaspati equal one measure of the bliss of Prajapati, and also the bliss of one learned in revelation who is not struck by desire. A hundred measures of the bliss of Prajapati equal one measure of the bliss of Brahma, and also the bliss of one learned in revelation who is not struck by desire. The one who is here in the person and the one who is there in the sun are one. Knowing this, on departing from this world one approaches this food-formed self, approaches this vital-breath self, approaches this mind-formed self, approaches this understanding-formed self, and approaches this bliss-formed self. A verse concerning this follows.
व्याख्या
यह गणना आनन्द का प्रयोगशाला-मापन नहीं, कल्पनीय समृद्धि से भी आगे बढ़ने वाला शिक्षण-उपाय है। प्रत्येक सोपान पर कामना से अनाहत श्रोत्रिय को समान आनन्द कहना विषय-संपत्ति और आन्तरिक स्वतन्त्रता का अन्तर दिखाता है। गन्धर्व, पितर और देव इस वैदिक विश्व-दृष्टि की श्रेणियाँ हैं। सबसे ऊपरी मापित सोपान के ब्रह्मणः को यहाँ ब्रह्मा समझा गया है; अनन्त ब्रह्म को किसी संख्यात्मक सीमा में बाँधना आशय नहीं है। पाँच आत्मरूपों के निकट जाने का क्रम पूरा रखा गया है।
Explanation
The calculation is a teaching device, not a laboratory scale of happiness. At each level the learned person uninjured by desire is assigned the same bliss, distinguishing accumulation of desirable objects from inward freedom. Gandharvas, ancestors, and gods belong to this Vedic cosmology. Brahmanah at the highest measured level is here understood as the cosmic Brahma; the infinite is not thereby confined to a numerical total. All five movements through the food, breath, mind, understanding, and bliss selves are retained.
संदर्भ
सातवें अनुवाक के भय और आनन्द की चर्चा अब ब्रह्मानन्द-मीमांसा में विस्तृत होती है। मानुष आनन्द से दस सौगुने सोपान बनते हैं, फिर व्यक्ति और सूर्य में एक तत्त्व की घोषणा आती है।
Context
The preceding treatment of awe and delight expands into an inquiry into bliss. Ten hundredfold steps rise from human enjoyment, followed by the identity of the reality in person and sun.