Passage 2.5
विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च । विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति शरीरे पाप्मनो हित्वा । सर्वान्कामान्समश्नुत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात् । अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
विज्ञानम् यज्ञम् तनुते, कर्माणि अपि च तनुते । सर्वे देवाः विज्ञानम् ज्येष्ठम् ब्रह्म उपासते । विज्ञानम् ब्रह्म चेत् वेद, तस्मात् चेत् न प्रमाद्यति, शरीरे पाप्मनः हित्वा सर्वान् कामान् समश्नुते इति । तस्य एषः एव शारीरः आत्मा [अस्ति], यः पूर्वस्य [आत्मा अस्ति] । तस्मात् वै एतस्मात् विज्ञानमयात् अन्यः अन्तरः आनन्दमयः आत्मा [अस्ति] । तेन एषः पूर्णः [अस्ति] । सः वै एषः पुरुषविधः एव [अस्ति] । तस्य पुरुषविधताम् अनु अयम् पुरुषविधः [अस्ति] । तस्य प्रियम् एव शिरः [अस्ति]; मोदः दक्षिणः पक्षः [अस्ति]; प्रमोदः उत्तरः पक्षः [अस्ति]; आनन्दः आत्मा [अस्ति]; ब्रह्म पुच्छम् प्रतिष्ठा [अस्ति] । तत् अपि एषः श्लोकः भवति ।
हिन्दी अर्थ
विज्ञान यज्ञ को सम्पन्न करता है और कर्मों को भी सम्पन्न करता है। सभी देवता विज्ञान को ज्येष्ठ ब्रह्म के रूप में उपासते हैं। यदि कोई विज्ञान को ब्रह्म जाने और उससे प्रमाद न करे, तो शरीर में पापों को छोड़कर सभी कामनाओं की पूर्णता पाता है। यही पूर्ववर्ती मनोमय का शरीरस्थ आत्मा है। इस विज्ञानमय से भिन्न, उसके भीतर आनन्दमय आत्मा है। उससे यह पूर्ण है। वह भी मानवाकृति है; पहले की मानवाकृति के अनुसार यह भी मानवाकृति है। उसका प्रिय सिर है, मोद दक्षिण पक्ष, प्रमोद उत्तर पक्ष, आनन्द मध्य और ब्रह्म पुच्छ तथा प्रतिष्ठा है। इसके विषय में भी अगला श्लोक है।
English meaning
Discerning understanding carries out sacrifice and carries out actions as well. All the gods contemplate understanding as the eldest Brahman. If one knows understanding as Brahman and does not lapse from it, one leaves evils in the body and experiences the fulfilment of every desire. This is the embodied inner self of the preceding mind-formed self. Different from and within this understanding-formed self is a bliss-formed self. The former is filled by it. It too has a human configuration, following that of the preceding self. Its head is the dear or pleasing, its right wing delight, its left wing heightened delight, its centre bliss, and its tail and supporting base Brahman. A verse concerning this follows.
व्याख्या
प्रिय, मोद और प्रमोद आनन्द के क्रमभेदों को दिखाते हैं; पर ब्रह्म को प्रतिष्ठा कहना प्रश्न को केवल सुखद अनुभव तक सीमित नहीं रहने देता। आनन्दमय और ब्रह्म का ठीक सम्बन्ध वेदान्त की व्याख्या-परम्पराओं में अलग तरह से समझाया जाता है। यह अनुवाद उस मतभेद को छिपाकर किसी एक निष्कर्ष को मूल शब्दों में नहीं जोड़ता।
Explanation
The dear, delight, and heightened delight distinguish modes of enjoyment, while Brahman as supporting base prevents the inquiry from ending with a passing pleasant experience. Vedanta traditions interpret the precise relation of the bliss-formed self to Brahman differently.
संदर्भ
विज्ञानमय को कर्तृत्व से जोड़ने के बाद पाठ आनन्दमय पर पहुँचता है। प्रसन्नता के विभिन्न रूप उसके रूपक-अङ्ग बनते हैं।
Context
After linking understanding with agency, the text reaches the bliss-formed self. Different modes of pleasure and delight become its figurative components.