Passage 2.3
प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । मनुष्याः पशवश्च ये । प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात् सर्वायुषमुच्यते । सर्वमेव त आयुर्यन्ति । ये प्राणं ब्रह्मोपासते । प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात् सर्वायुषमुच्यत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य यजुरेव शिरः । ऋग्दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः । आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
देवाः, मनुष्याः, ये पशवः च [सन्ति], [ते] प्राणम् अनु प्राणन्ति । प्राणः हि भूतानाम् आयुः [अस्ति]; तस्मात् सर्वायुषम् उच्यते । ये प्राणम् ब्रह्म उपासते, ते सर्वम् एव आयुः यन्ति । प्राणः हि भूतानाम् आयुः [अस्ति]; तस्मात् सर्वायुषम् उच्यते इति । तस्य एषः एव शारीरः आत्मा [अस्ति], यः पूर्वस्य [आत्मा अस्ति] । तस्मात् वै एतस्मात् प्राणमयात् अन्यः अन्तरः मनोमयः आत्मा [अस्ति] । तेन एषः पूर्णः [अस्ति] । सः वै एषः पुरुषविधः एव [अस्ति] । तस्य पुरुषविधताम् अनु अयम् पुरुषविधः [अस्ति] । तस्य यजुः एव शिरः [अस्ति]; ऋक् दक्षिणः पक्षः [अस्ति]; साम उत्तरः पक्षः [अस्ति]; आदेशः आत्मा [अस्ति]; अथर्वाङ्गिरसः पुच्छम् प्रतिष्ठा [सन्ति] । तत् अपि एषः श्लोकः भवति ।
हिन्दी अर्थ
देवता प्राण का अनुसरण करके प्राणन करते हैं, और जितने मनुष्य तथा पशु हैं वे भी। प्राण प्राणियों का जीवन है, इसलिए उसे सबका आयुष्य कहा जाता है। जो प्राण को ब्रह्म मानकर उपासते हैं वे पूर्ण आयु प्राप्त करते हैं। प्राण प्राणियों का जीवन है, इसलिए उसे सबका आयुष्य कहा जाता है। यही पूर्ववर्ती अन्नमय का शरीरस्थ आत्मा है। इस प्राणमय से भिन्न, उसके भीतर मनोमय आत्मा है। उससे यह पूर्ण है। वह भी मानवाकृति है; पहले की मानवाकृति के अनुसार यह भी मानवाकृति है। उसका यजुष् सिर, ऋक् दक्षिण पक्ष, साम उत्तर पक्ष, आदेश मध्य और अथर्वाङ्गिरस पुच्छ तथा प्रतिष्ठा हैं। इसके विषय में भी अगला श्लोक है।
English meaning
The gods breathe by following vital breath, as do human beings and animals. Vital breath is the life of beings and is therefore called the life-span of all. Those who contemplate vital breath as Brahman attain their full life-span. Vital breath is the life of beings; therefore it is called the life-span of all. This is the embodied inner self of the preceding food-formed self. Different from and within this breath-formed self is a mind-formed self. The former is filled by it. It too has a human configuration, following that of the preceding self. Its head is Yajus, its right wing Rig, its left wing Saman, its centre authoritative instruction, and its tail and supporting base the Atharvan-Angiras texts. A verse concerning this follows.
व्याख्या
अनु प्राणन्ति जीवन की अनेक गतिविधियों की प्राण पर निर्भरता दिखाता है। पूरी आयु पाने की बात धार्मिक फलश्रुति है, चिकित्सा की गारंटी या किसी बीमार व्यक्ति के अध्ययन की कमी का प्रमाण नहीं। यजुष्, ऋक्, साम और अथर्वाङ्गिरस मन को वाणी, स्मृति और अर्थग्रहण के क्षेत्र में रखते हैं।
Explanation
Breathing after vital breath expresses the dependence of diverse activities on life. The promised full life-span is religious praise, not a guarantee of health or evidence that illness reflects inadequate spiritual practice. Yajus, Rig, Saman, and Atharvan-Angiras locate the mind in the domain of utterance, memory, and intelligible instruction.
संदर्भ
प्राणमय के महत्व की स्तुति के बाद मनोमय को उसके भीतर का आत्मा कहा जाता है। मन का रूप यहाँ वैदिक मन्त्र और शिक्षण की श्रेणियों से निर्मित है।
Context
Praise of vital breath is followed by the mind-formed self within it. Mind is represented through categories of Vedic recitation and instruction.