Passage 2.7
असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । तदात्मानँ स्वयमकुरुत । तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति । यद्वै तत् सुकृतम् । रसो वै सः । रसँ ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति । को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात् । यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । एष ह्येवानन्दयाति । यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । अथ सोऽभयं गतो भवति । यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते । अथ तस्य भयं भवति । तत्त्वेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य । तदप्येष श्लोको भवति ॥१॥
पदच्छेद
अन्वय
इदम् अग्रे असत् वा आसीत् । ततः वै सत् अजायत । तत् स्वयम् आत्मानम् अकुरुत; तस्मात् तत् सुकृतम् उच्यते इति । यत् वै तत् सुकृतम् [अस्ति], सः वै रसः [अस्ति] । अयम् हि रसम् एव लब्ध्वा आनन्दी भवति । यदि एषः आकाशः आनन्दः न स्यात्, कः हि एव अन्यात्, कः प्राण्यात्? एषः हि एव आनन्दयाति । यदा हि एव एषः एतस्मिन् अदृश्ये अनात्म्ये अनिरुक्ते अनिलयने अभयम् [निर्भयतया] प्रतिष्ठाम् विन्दते, अथ सः अभयम् गतः भवति । यदा हि एव एषः एतस्मिन् उद् अरम् अन्तरम् कुरुते, अथ तस्य भयम् भवति । तत् तु एव अमन्वानस्य [एकत्वेन] विदुषः [भेदेन] भयम् [भवति] । तत् अपि एषः श्लोकः भवति ।
हिन्दी अर्थ
आरम्भ में यह असत्, अप्रकट, था; उससे सत् उत्पन्न हुआ। उसने स्वयं अपने को बनाया; इसलिए उसे सुकृत, स्वयं निर्मित और उत्तम कृति, कहते हैं। जो वह सुकृत है, वह रस ही है; उसी रस को पाकर यह व्यक्ति आनन्दित होता है। कौन साँस लेता और कौन प्राणन करता, यदि आकाश में यह आनन्द न होता? वही आनन्द देता है। जब यह व्यक्ति अदृश्य, अशरीर, अवर्णनीय और किसी दूसरे आश्रय पर न टिके उस तत्त्व में निर्भय प्रतिष्ठा पाता है, तब वह अभय को प्राप्त होता है। लेकिन जब उसमें तनिक भी अन्तर बनाता है, तब उसके लिए भय होता है। उसी को भिन्न मानने वाले जानकार के लिए भी वह भय का कारण है। इसके विषय में भी अगला श्लोक है।
English meaning
In the beginning this was non-being, the unmanifest; from it being arose. It fashioned itself by itself, and is therefore called the self-made, the well-made. That which is well-made is indeed rasa, the essence of delight. On gaining that essence, this person becomes joyful. Who could breathe out or breathe in if this bliss were not in space? It alone gives joy. When one finds fearless grounding in that which is unseen, bodiless, beyond description, and without another supporting base, one reaches fearlessness. But when one makes even a small separation within it, fear arises. It becomes a source of fear even for a learned person who does not apprehend it rightly. A verse concerning this follows.
व्याख्या
असत् को यहाँ अप्रकट समझना एक पारम्परिक व्याख्या है, पूर्ण शून्य से पदार्थ बनने का वैज्ञानिक सिद्धान्त नहीं। रस स्वाद की परिचित छवि से आनन्द के आधार की ओर ले जाता है। उदरम् को उत् अरम् नहीं, उत अरम्, तनिक भी, के रूप में खोलने पर विभेद और भय का सम्बन्ध स्पष्ट होता है। इसे वास्तविक खतरे में सावधानी छोड़ने का निर्देश नहीं मानना चाहिए।
Explanation
Understanding non-being here as the unmanifest is a traditional interpretation, not a scientific theory of matter emerging from absolute nothing. Rasa moves from the familiar image of taste toward the ground of delight. Resolving udaram as uta aram, even a little, brings out the connection between separation and fear. The teaching does not instruct a reader to ignore real danger.
संदर्भ
सृष्टि-कथा अब रस और आनन्द से ब्रह्म की पहचान करती है। फिर उपासना के लक्ष्य को भय से मुक्ति के रूप में व्यक्त करती है।
Context
The creation account now identifies the ultimate with rasa and bliss. It then describes the aim of realization through the language of freedom from fear.