Passage 2.4
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यतः मनसा सह [ब्रह्म] अप्राप्य वाचः निवर्तन्ते, [तस्य] ब्रह्मणः आनन्दम् विद्वान् [जनः] कदाचन न बिभेति इति । तस्य एषः एव शारीरः आत्मा [अस्ति], यः पूर्वस्य [आत्मा अस्ति] । तस्मात् वै एतस्मात् मनोमयात् अन्यः अन्तरः विज्ञानमयः आत्मा [अस्ति] । तेन एषः पूर्णः [अस्ति] । सः वै एषः पुरुषविधः एव [अस्ति] । तस्य पुरुषविधताम् अनु अयम् पुरुषविधः [अस्ति] । तस्य श्रद्धा एव शिरः [अस्ति]; ऋतम् दक्षिणः पक्षः [अस्ति]; सत्यम् उत्तरः पक्षः [अस्ति]; योगः आत्मा [अस्ति]; महः पुच्छम् प्रतिष्ठा [अस्ति] । तत् अपि एषः श्लोकः भवति ।
हिन्दी अर्थ
जिसे प्राप्त किए बिना वाणी मन के साथ लौट आती है, उस ब्रह्म के आनन्द को जानने वाला कभी नहीं डरता। यही पूर्ववर्ती प्राणमय का शरीरस्थ आत्मा है। इस मनोमय से भिन्न, उसके भीतर विज्ञानमय आत्मा है। उससे यह पूर्ण है। वह भी मानवाकृति है; पहले की मानवाकृति के अनुसार यह भी मानवाकृति है। उसकी श्रद्धा सिर है, ऋत दक्षिण पक्ष, सत्य उत्तर पक्ष, योग मध्य और महः पुच्छ तथा प्रतिष्ठा है। इसके विषय में भी अगला श्लोक है।
English meaning
The one who knows the bliss of Brahman, from which words turn back together with the mind without reaching it, never fears. This is the embodied inner self of the preceding breath-formed self. Different from and within this mind-formed self is a self formed of discerning understanding. The former is filled by it. It too has a human configuration, following that of the preceding self. Its head is trust, its right wing right order, its left wing truth, its centre disciplined integration, and its tail and supporting base Mahah. A verse concerning this follows.
व्याख्या
विज्ञान का अर्थ यहाँ आधुनिक प्रयोगात्मक विज्ञान नहीं, विवेकपूर्ण और निश्चयात्मक समझ है। श्रद्धा, ऋत, सत्य और योग को उसके अङ्ग बताकर ज्ञान को केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं माना गया। मन की सीमा का कथन विचार की निरर्थकता नहीं, ब्रह्म को सीमित वस्तु बनाकर पकड़ने की सीमा बताता है।
Explanation
Vijnana here means discerning or determinative understanding, not modern experimental science. Trust, order, truth, and integration make it more than a store of information. The limit of mind does not make thought useless; it questions the attempt to grasp Brahman as a bounded object among other objects.
संदर्भ
मनोमय के वर्णन के बाद वाणी और मन की सीमा कही जाती है, फिर विज्ञानमय का प्रवेश होता है। यहाँ निर्णय और सत्याभिमुख जीवन के गुणों का विन्यास है।
Context
After the mind-formed self, the limits of speech and mind are stated, followed by the discerning self. Its components are qualities of judgement and truthful orientation.