आज एक प्रश्न के साथ शुरुआत करते हैं।

क्या हम दिवाली मनाना भूल रहे हैं?

आप कहेंगे, "कैसी बातें करते हैं? दिवाली मनाना कैसे भूल जाएँगे? हम तो सालों से मनाते आ रहे हैं।"

हर साल की तरह, इस साल की पूरी तैयारी कर ली है:

  • मिठाइयों के ऑर्डर कर दिए हैं।

  • घर की सफ़ाई करा दी है।

  • दीवारें पेंट कर दी गई हैं।

  • ढेर सारी जगमगाने वाली लाइट ख़रीद लाए हैं। कुछ लाइट पिछले सालों से भी बची हैं।

  • अभी से ही घरों में लगा भी दिए गए हैं।

चमकता है अपना घर। कभी हमारे घर के सामने गुजरियेगा तो आपको मालूम चलेगा कि हम कितनी धूमधाम से दिवाली मनाते हैं।

हाँ, बस पटाखे खरीद लाने बाकी हैं और फिर शुरू हो जाएगी धूम-धड़ाम।

जब आप की इस तरह की बातें सुनता हूँ, तब सच में लगता है। पूछ लूँ, कुछ बाकी तो नहीं रह गया? कहीं सच में भूल ही तो नहीं गए हैं।

क्यों मनाते हैं हम दिवाली?

  • राम, रावण का वध करके अयोध्या लौट आए आज के ही दिन, इसलिए?

  • या आज के ही दिन समुद्र मंथन से लक्ष्मी माता प्रकट हुई थी, इसलिए?

  • या फिर भगवान महावीर को आज के ही दिन मोक्ष प्राप्त हुआ था, इसलिए?

  • या इसलिए क्योंकि आज के ही दिन, भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध कर दिया था?

अगर दिवाली मनाने के पीछे एक ही उद्देश्य होता, तो कहानी भी एक ही होती। लेकिन यहाँ हर समाज और व्यक्ति के पास अलग-अलग कारण हैं। फिर तो ऐसा संभव है कि वास्तविक कारण कोई और ही हो।

समाज में जितनी भी लोक कहानियाँ या पौराणिक कहानियाँ होती हैं, उनमें अधिकांश रूपक (metaphor) में होती हैं।

गूढ़ विषय, विज्ञान, स्वास्थ्य आदि के रहस्य कुछ ऐतिहासिक तथ्य या काल्पनिक कहानियों के साथ इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि वह जन सामान्य के लिए बिलकुल सरल हो जाता है। जिससे समाज का हर वर्ग उसका लाभ उठा पाता है। चाहे वह कहानी के सार को समझ पाये या ना समझ पाये। क्योंकि कहानी के रूप में किसी बात को याद रखना सबसे आसान तरीका है।

फसल का उत्सव

भारत आज भी एक कृषि प्रधान देश है। मौसम की विविधता के कारण अलग-अलग प्रांत में खेती के समय, तरीकों, उपज आदि में थोड़ी भिन्नता दिखेगी। लेकिन अगर आप मूल मेल देखेंगे, तो पूरे भारत में दो फसलें मूल रूप से उगाई जाती हैं।

जिन्हें आप "रबी" और "खरीफ़" फसल के नाम से जानते हैं।

रबी और खरीफ दोनों अरबी शब्द हैं, जिनका अर्थ है - वसंत और शरद।

हमारा दो मुख्य त्यौहार आता है वसंत में होली और शरद में दिवाली।

इस तरह ये दोनों पर्व फसल की कटाई और समृद्धि के उत्सव का प्रतीक हैं।

दीयों का महत्व

लेकिन इसी तरह क्यों मनाते हैं, यह जानना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

रंग लगा लेते, पानी से गीला कर देते दिवाली में भी होली की तरह, बाकी पर्वों की तरह उपवास रख लेते, मेला लगा लेते और भी कई तरीके हो सकते थे। है न!

लेकिन दिवाली में हमने चुना दीया जलाना। यह अकारण नहीं है। उसके कारण को समझते हैं:

दिवाली कार्तिक मास के अमावस्या को मनाते हैं।

अगर आप भारतीय कैलेंडर को देखें -

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।

आषाढ़ से बारिश शुरू हुई। बारिश के बाद श्रावण और आश्विन तक मौसम तो बदला ही।

लेकिन एक मुख्य घटना होती है इस ऋतु में प्रकृति अपना विस्तार करती है। पेड़-पौधे, घास आदि बहुत अधिक विस्तार लेते हैं। इसी मौसम में कीट-पतंगे भी विस्तार लेते हैं।

क्योंकि कीट-पतंगे जीवाणु, विषाणु को फैलाने में मुख्य भूमिका निभाते हैं, इसलिए इनका नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है।

इसलिए हम इस मौसम के समाप्त होते और शरद के शुरू होते ही घर की सफाई करते हैं। अपने अड़ोस-पड़ोस की सफाई करते हैं, जिससे घर के अंदर से फंगस आदि जो बेकार चीजों को विस्तार हुआ, उसे हटा लिया जाए।

दिवाली के दिन तेल और घी के दीये जलाते हैं, जिससे कीट-पतंगे आकर उस अग्नि में कूद कर जल जाएं।

अब बताओ,

जब ढेर सारी प्लास्टिक की लड़ियों वाली लाइट्स आप लटका तो देते हो, क्या सच में उनमें कोई कीट-पतंगा मर सकेगा? हो सकता है एक बार ख़रीदने पर वह 4-5 साल चल सकेगा। आपके पैसे बच गए इस साल, लेकिन क्या सच में आप लाभ में हैं?

यह कुछ और नहीं, बस दूरदर्शिता का अभाव है। यही कीट-पतंगे जो बच गए, आपके परिवार के या आपके पड़ोस के बीमारी का कारण बनेंगे।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अगर देखा जाये, तो दिवाली की रात ध्यान साधना के लिए बहुत ही सुंदर रात होती है।

अमावस्या की रात में प्रकृति अपेक्षाकृत ज़्यादा शांत होती है, खासकर शरद की सारी अमावस्या।

शहरों में यह नहीं हो पाता और पटाखों आदि की आवाज़ के कारण दिवाली की रात भी शांत नहीं हो पाती है।

मिट्टी के दीये का लाभ

एक और दृष्टिकोण से भी मिट्टी का दीया कैसे लाभकारी हो सकेगा हमारे समाज के लिए:

  • मिट्टी का दीया बिलकुल भी प्रदूषण नहीं करेगा, प्लास्टिक वाले लाइट के तुलना में तो न के बराबर।

  • मिट्टी का दीया समाज और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए लाभकारी है।

  • मिट्टी के दीये बनाने का व्यापार चलेगा, जिससे लाखों लोगों का रोजगार होगा।

  • रूई और कपड़े की बाती बनाने वालों को रोज़गार मिलता है।

  • दीयों में जलने वाले तेल की खेती भी बढ़ती है — चाहे वह सरसों का हो या अन्य कोई ऐसा तेल जो खाने योग्य न हो।

एक महत्वपूर्ण बात

कभी हम चीन के विरोध में होते हैं, कभी अमेरिका के विरोध में, तो कभी पाकिस्तान, कभी बांग्लादेश, तो कभी अन्य देश या समाज के विरोध में।

लेकिन दूसरे का विरोध करने से बेहतर है कि हमें अपने आप से प्रेम करना सीखना चाहिए। अपने इतिहास को, अपने संस्कारों को समझना चाहिए।

अपने पूर्वजों को समझना चाहिए। हमें उनकी बातों को ठीक समझना ही होगा।

उसे परखना होगा, उसे decode करना होगा।

उनकी हर बात अच्छी नहीं होगी, तो हर बात बुरी भी नहीं रही होगी।

जो अच्छी रही होगी, जिसमें वैज्ञानिकता रही होगी, उसे हमें अपने जीवन में धारण करना चाहिए।

नहीं तो,

दिवाली जैसा महत्वपूर्ण सामाजिक उल्लास और प्राकृतिक सामंजस्य का त्यौहार बस प्लास्टिक लाइट की लड़ियाँ, तेज पटाखे के बीच में अपनी आत्मा खो देगा।

दिवाली का सही तरीका

अगर आप मुझसे पूछें, मैं कैसी दिवाली होनी चाहिए:

  • दिवाली का त्यौहार एक सौहार्द का पर्व है। ऐसे में सारा परिवार एक साथ मिलकर इसे आनंद से मनाए।

  • अपनी क्षमता, शौक और आवश्यकता के अनुसार मिट्टी के दीये, तेल और कपड़े या रूई की बाती से मनानी चाहिए।

  • संयम रखना चाहिए, प्रतिस्पर्धा से बचना चाहिए। पड़ोसी ने अपने घर में 1500 दीये लगा दिए हैं, तो हमें जरुरी नहीं कि 1600 लगा ही दें। हमारा काम 20-50 में हो जायेगा। हमारे पास जितना है, उतना ही पर्याप्त है।

  • अपना और अपने परिवार का ध्यान के साथ-साथ अपने अड़ोस-पड़ोस, समाज और पर्यावरण का भी ध्यान रखना चाहिए।

कोई भी एक छूटा तो मैं आपसे गाहे-बगाहे फिर पूछ बैठूंगा, कहीं हम दिवाली मनाना भूल तो नहीं गए?

आइये इस बार एक पूर्ण दिवाली मनाएं।

नमस्कार